राजस्थान की राजपरंपरा में जन्मी मीराबाई के जीवन से जुड़ी अनेक कथाएँ लोक-स्मृति और भक्त-परंपरा में मिलती हैं। बाल्यकाल से ही उनका मन श्रीकृष्ण के स्वरूप में रम गया और गिरधर गोपाल उनके आराध्य बने।
विवाह के बाद राजमहल की मर्यादाएँ, कुल-परंपराएँ और सांसारिक अपेक्षाएँ उनके सामने थीं, पर उनका आंतरिक संबंध कृष्ण से अधिक प्रबल रहा। वे मंदिर जातीं, संतों का संग करतीं और अपने भावों को पदों में व्यक्त करतीं।
उनके जीवन की कठिन घटनाओं के विवरण अलग-अलग परंपराओं में भिन्न मिलते हैं। इन कथाओं का मूल संदेश यह है कि उन्होंने भय, प्रतिष्ठा और विरोध से ऊपर प्रेमभक्ति को रखा।
मीराबाई के पदों में विरह, समर्पण, मिलन की आकांक्षा और कृष्ण के प्रति सहज संवाद मिलता है। आज भी उनके भजन संगीत, साहित्य और भक्ति—तीनों को जोड़ते हैं।
