Back to Bhakt
विष्णु भक्ति
पुराण-परंपरा

भक्त प्रह्लाद

Prahlada

प्रह्लाद की कथा बताती है कि बालक का अडिग नारायण-स्मरण भय, दमन और अहंकार के सामने भी नहीं डगमगाया।

दैत्यराज हिरण्यकशिपु का राज्य

नारायण-स्मरण में अडिग बाल भक्त प्रह्लाद की symbolic illustration

जीवन-कथा

पुराण-परंपरा में प्रह्लाद दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पुत्र माने जाते हैं। पिता स्वयं को सर्वोच्च मानता था, जबकि प्रह्लाद का विश्वास था कि श्रीहरि सर्वत्र उपस्थित हैं।

उन्हें नारायण-स्मरण से हटाने के अनेक प्रयास किए गए, पर उन्होंने वैर के स्थान पर शांत विश्वास रखा। कथा में विष, अग्नि, ऊँचाई और अन्य संकटों का वर्णन मिलता है; हर प्रसंग प्रह्लाद की स्थिर भक्ति को रेखांकित करता है।

जब हिरण्यकशिपु ने स्तंभ की ओर संकेत करके पूछा कि क्या भगवान इसमें भी हैं, तब नृसिंह रूप के प्राकट्य की कथा आती है। यह प्रसंग बताता है कि दिव्यता किसी एक स्थान या रूप तक सीमित नहीं है।

प्रह्लाद अपने पिता के विनाश में भी द्वेष नहीं रखते। उनकी करुणा और क्षमा इस कथा को केवल चमत्कार नहीं, आंतरिक धर्म की शिक्षा बनाती है।

नारायण सर्वत्र हैं।

जीवन के प्रमुख पड़ाव

बाल्यावस्था में नारायण-नाम में दृढ़ विश्वास

विरोध और भय के बीच भी जप न छोड़ना

नृसिंह अवतार की कथा से जुड़ा निर्णायक प्रसंग

क्षमा और करुणा का आदर्श

आज के लिए सीख

सच्चा स्मरण कठिन परिस्थिति में भी साधक को स्थिर रखता है।

भगवान को केवल एक स्थान तक सीमित न मानें।

भक्ति के साथ करुणा और क्षमा भी आवश्यक हैं।

संबंधित आराध्य

Open Aradhya

Continue exploring

आगे क्या देखें या पढ़ें?

इसी विषय, आराध्य और भक्ति-रुचि से जुड़ी अगली सामग्री सीधे यहाँ से खोलें।