पुराण-परंपरा में प्रह्लाद दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पुत्र माने जाते हैं। पिता स्वयं को सर्वोच्च मानता था, जबकि प्रह्लाद का विश्वास था कि श्रीहरि सर्वत्र उपस्थित हैं।
उन्हें नारायण-स्मरण से हटाने के अनेक प्रयास किए गए, पर उन्होंने वैर के स्थान पर शांत विश्वास रखा। कथा में विष, अग्नि, ऊँचाई और अन्य संकटों का वर्णन मिलता है; हर प्रसंग प्रह्लाद की स्थिर भक्ति को रेखांकित करता है।
जब हिरण्यकशिपु ने स्तंभ की ओर संकेत करके पूछा कि क्या भगवान इसमें भी हैं, तब नृसिंह रूप के प्राकट्य की कथा आती है। यह प्रसंग बताता है कि दिव्यता किसी एक स्थान या रूप तक सीमित नहीं है।
प्रह्लाद अपने पिता के विनाश में भी द्वेष नहीं रखते। उनकी करुणा और क्षमा इस कथा को केवल चमत्कार नहीं, आंतरिक धर्म की शिक्षा बनाती है।