ध्रुव राजा उत्तानपाद के बालक थे। परिवार में मिले तिरस्कार से उनका मन व्यथित हुआ और वे ऐसा स्थान पाने की इच्छा से वन की ओर गए जिसे कोई छीन न सके।
मार्ग में नारद से उन्हें दिशा और मंत्र-स्मरण मिला। कथा के अनुसार ध्रुव ने क्रमशः इंद्रियों को संयमित किया, मन को एकाग्र किया और नारायण का ध्यान किया।
तप के बाद उन्हें भगवान का दर्शन हुआ। उस क्षण उनकी प्रारम्भिक सांसारिक इच्छा छोटी लगने लगी और भीतर कृतज्ञता तथा विवेक जागा।
ध्रुव-तारे का प्रतीक स्थिरता से जुड़ा है। इसलिए ध्रुव की कथा बच्चों और बड़ों दोनों को बताती है कि पीड़ा को जिद में नहीं, साधना और स्पष्ट उद्देश्य में बदला जा सकता है।