रामायण और लोक-परंपरा में शबरी को मतंग ऋषि की शिष्या तथा आश्रम-सेविका के रूप में स्मरण किया जाता है। गुरु के वचन पर विश्वास रखते हुए वे श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा करती रहीं।
उनकी साधना भव्य अनुष्ठानों से अधिक दैनिक सेवा में दिखाई देती है—आश्रम को स्वच्छ रखना, मार्ग तैयार करना, जल और फल एकत्र करना तथा नाम-स्मरण करना।
जब राम और लक्ष्मण आश्रम पहुँचे, शबरी ने श्रद्धा से उनका स्वागत किया। लोककथाओं में चखे हुए बेर का लोकप्रिय प्रसंग मिलता है; विभिन्न ग्रंथ-परंपराएँ इस विवरण को अलग ढंग से प्रस्तुत करती हैं, पर भाव निष्कपट आतिथ्य का है।
शबरी की कथा सिखाती है कि सामाजिक स्थिति, शिक्षा या वैभव भक्ति की पात्रता तय नहीं करते। प्रतीक्षा भी साधना बन सकती है, जब उसमें सेवा और विश्वास हो।