सुदामा और कृष्ण को गुरु-सांदीपनि के आश्रम के सहपाठी मित्रों के रूप में स्मरण किया जाता है। समय बीतने पर कृष्ण द्वारका के राजा बने और सुदामा अत्यंत साधारण जीवन जीते रहे।
परिवार के आग्रह पर सुदामा सहायता की आशा से द्वारका गए, पर मन में संकोच था। वे भेंट के रूप में थोड़े से चिवड़े साथ ले गए—सामग्री छोटी थी, पर मित्रता और प्रेम से भरी।
कथा में कृष्ण का सुदामा का आदरपूर्वक स्वागत, चरण धोना और पुरानी स्मृतियाँ साझा करना विशेष है। इससे पद और संपत्ति से परे संबंध की गरिमा दिखाई देती है।
सुदामा अपनी आवश्यकता स्पष्ट कहे बिना लौटते हैं और घर पहुँचकर कृपा का अनुभव करते हैं। कथा का केंद्र केवल भौतिक समृद्धि नहीं, निष्काम मित्रता और विनम्रता है।