प्रदोष व्रत शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की संध्या से जुड़ा शिव-उपासना का अवसर है। भक्त अपनी क्षमता के अनुसार उपवास, शिव-नाम जप, दीप और सरल पूजा करते हैं।
व्रत का स्वरूप स्वास्थ्य, आयु और पारिवारिक परंपरा के अनुसार बदल सकता है। भोजन या औषधि से जुड़े निर्णय में शरीर की आवश्यकता को प्राथमिकता दें।